जंगल में पेड़ के नीचे पोटली के पास बैठा उदास बुनकर, ऊपर रात का आसमान

दुर्भाग्यशाली बुनकर

Intermediate · ≈ 5 min story · 4 min read

एक मेहनती बुनकर पाँच साल की कमाई जंगल में खो देता है, फिर भी हार नहीं मानता। रहस्यमयी आवाज़ों और दो व्यापारियों से मिलकर वह सीखता है कि धन का असली मोल उसे अच्छे कामों में लगाने और दूसरों के साथ बाँटने में है।

एक गाँव में एक बुनकर रहता था, जो बहुत सुंदर कपड़े बुनता था। उसके हाथों में कमाल का हुनर था, लेकिन इतनी मेहनत करने के बाद भी उसकी आमदनी बहुत कम थी। एक दिन उसने उदास होकर अपनी पत्नी से कहा, "मुझसे कम सुंदर कपड़ा बुनने वाले लोग भी मुझसे ज्यादा पैसा कमाते हैं। मुझे लगता है, इस जगह पर मेरी किस्मत ही मेरा साथ नहीं दे रही।"

उसकी पत्नी ने प्यार से समझाया, "मेहनत कभी बेकार नहीं जाती। यहीं रहकर कोशिश करते रहो।" लेकिन बुनकर ने दूसरे शहर जाकर अपनी किस्मत आज़माने का फैसला कर लिया, और वह घर से निकल पड़ा। नए शहर में उसने खूब मेहनत की। दिन बीतते गए... और देखते ही देखते पाँच साल गुजर गए, और इन पाँच सालों में बुनकर ने अच्छी-खासी दौलत जमा कर ली। वह बहुत खुश था।

उसने सोचा, "अब मैं अपने गाँव वापस जाऊँगा।" अपनी सारी कमाई साथ लेकर वह घर की ओर चल पड़ा। रास्ता लंबा था, शाम होते-होते वह एक जंगल में पहुँच गया, और अंधेरा बढ़ने लगा, इसलिए रात में चलना ठीक न समझकर वह एक पेड़ के नीचे रुका और वहीं सो गया।

रात में अचानक उसकी आँख खुली। उसे लगा जैसे पास में दो लोग बातें कर रहे हों। एक आवाज़ फुसफुसाकर बोली, "तुमने इस बुनकर को इतना धन क्यों दिया? इसकी किस्मत में तो केवल खाने और पहनने भर का धन है।" दूसरी आवाज़ ने शांत स्वर में जवाब दिया, "मैं भाग्य हूँ। मेहनत करने वाले को उसकी मेहनत का फल देना मेरा काम है। आगे उसके साथ क्या होगा, यह तुम्हारे हाथ में है।" बुनकर ने घबराकर अपनी पोटली देखी।

उसका सारा धन गायब था! पाँच साल की मेहनत... एक ही रात में चली गई। बेचारा बुनकर खाली हाथ अपने गाँव लौट आया। लेकिन उसने हार नहीं मानी। कुछ समय बाद वह फिर उसी शहर गया, इस बार पहले से भी ज्यादा काम किया, और एक साल में फिर से काफी धन जमा कर लिया। उसने सोचा, "मैं जंगल में रुकूँगा ही नहीं। चाहे रात हो जाए, चलता रहूँगा।" वह अपनी पोटली लेकर गाँव की ओर निकल पड़ा।

लेकिन रास्ते में... उसे फिर वही दो आवाज़ें सुनाई दीं। एक आवाज़ बोली, "तुमने बुनकर को इतना धन फिर क्यों दिया? तुम जानते हो कि उसकी किस्मत में इतना धन नहीं है।" दूसरी आवाज़ ने कहा, "मेहनत का फल देना मेरा काम है। आगे तुम जानो।" बुनकर ने तुरंत अपनी पोटली खोली, धन फिर गायब था! अब वह पूरी तरह टूट गया। उसने दुखी होकर कहा, "जब मेरी मेहनत की कमाई हर बार मुझसे छिन जाती है, तो मेरे जीने का क्या फायदा?"

तभी आकाश से एक आवाज़ सुनाई दी। "बुनकर, निराश मत हो। मैं तुम्हारी मेहनत से खुश हूँ। तुम जो वरदान चाहो, माँग सकते हो।" बुनकर ने तुरंत कहा, "मुझे बहुत सारा धन चाहिए!" आवाज़ ने समझाया, "इतना धन लेकर क्या करोगे, जिसका तुम उपयोग ही न कर सको?" लेकिन बुनकर अपनी बात पर अड़ा रहा, तब आवाज़ ने कहा, "ठीक है। पहले अपने गाँव वापस जाओ। वहाँ दो व्यापारियों से मिलो। फिर तय करना कि तुम्हें क्या चाहिए।"

बुनकर गाँव पहुँचा और पहले व्यापारी के घर गया। वहाँ उसका स्वागत अच्छे से नहीं हुआ, फिर भी व्यापारी ने उसे खाना दिया और रात बिताने के लिए जगह दे दी। उस रात बुनकर ने फिर वही रहस्यमयी आवाज़ें सुनीं। एक आवाज़ बोली, "तुमने इस व्यापारी को बुनकर की इतनी अच्छी खातिरदारी क्यों करने दी?" दूसरी आवाज़ ने जवाब दिया, "अपनी चीज़ों का क्या करना है, यह फैसला उसका है।"

अगले दिन राजा के सेवक वहाँ आए और उस व्यापारी को खूब सारा धन देकर चले गए। अब बुनकर दूसरे व्यापारी के घर गया, जिसने उसका बहुत प्यार से स्वागत किया, उसे अच्छा खाना खिलाया और आराम करने के लिए जगह दी। अगले दिन राजा के सेवक वहाँ भी आए और उस व्यापारी को ढेर सारा धन दिया।

अब बुनकर समझ गया कि सिर्फ धन जमा कर लेना ही सबसे बड़ी बात नहीं है, धन का सही उपयोग करना और दूसरों के साथ बाँटना भी जरूरी है। उसने आकाश की ओर देखकर खुशी से कहा, "मुझे ऐसा धन चाहिए, जिसका मैं अच्छे कामों में उपयोग कर सकूँ और दूसरों के साथ बाँट सकूँ।" और इस तरह बुनकर ने अपनी मेहनत और अनुभव से एक बड़ी सीख पाई। उसकी कहानी तो यहीं पूरी हुई।

लेकिन उसी जंगल में दो सियार एक बैल को देखकर छिपे बैठे थे। एक सियार हँसते हुए बोला, "चलो, उसे मारकर खा लेते हैं!" दूसरे ने उसे रोका... आखिर उस बैल में ऐसा क्या था?

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