धूप में अनाज के दाने ढोती और कतार बनाकर चलती मेहनती चींटियाँ, और पास ही ठंड में काँपता खड़ा एक भूखा टिड्डा।

चींटी और टिड्डा

Beginner · ≈ 3 min story · 2 min read

सर्दियाँ शुरू होते ही चींटियों की पूरी बस्ती अनाज जमा करने में जुट जाती है, और तभी ठंड और भूख से काँपता एक टिड्डा उनसे दो-तीन दाने माँगने आ पहुँचता है। चींटी उसे ताना नहीं मारती, बस इतना पूछती है कि पूरी गर्मियों में उसने अपने लिए कुछ क्यों नहीं जोड़ा। यह कोमल कहानी बच्चों को समय की कदर करना और भविष्य के लिए तैयार रहना सिखाती है।

सर्दियों के दिन शुरू हो गए थे। चींटियों की पूरी बस्ती अपने लिए अनाज जमा करने में लगी हुई थी, कोई दाना ढोती, कोई कतार बनाकर चलती। वे गीले हुए अनाज के दानों को धूप में सुखा रही थीं। तभी वहाँ... एक टिड्डा आया। वह ठंड और भूख से बहुत कमजोर हो गया था, उसके पैर काँप रहे थे और उसकी आवाज़ धीमी पड़ चुकी थी।

टिड्डे ने चींटियों के पास आकर, विनती करते हुए धीरे से कहा, "चींटी बहन, मुझे अपने अनाज में से दो-तीन दाने खाने के लिए दे दो। मुझे बहुत भूख लगी है।" एक चींटी ने अपना दाना नीचे रखा, उसकी ओर देखा और साफ़ आवाज़ में बोली, "हमने यह अनाज इकट्ठा करने के लिए दिन-रात मेहनत की है! हम इसे तुम्हें क्यों दें?"

टिड्डा चुप हो गया... उसके पास कोई जवाब नहीं था। वह उदास होकर वहीं खड़ा रहा, ठंडी हवा में काँपता हुआ, और उसकी आँखें ज़मीन पर टिकी रहीं। चींटी ने कुछ पल उसे देखा, फिर नरमी से पूछा, "टिड्डे भाई, तुमने पूरी गर्मियों में अपने लिए अनाज क्यों नहीं जमा किया?" उसकी आवाज़ में ताना नहीं था, बस एक सीधा सवाल था।

टिड्डे ने एक लंबी साँस ली और शरमाते हुए बोला, "ओह! मैं तो पूरी गर्मियों में गाने और मस्ती करने में व्यस्त था। मुझे अनाज जमा करने का ध्यान ही नहीं रहा।" चींटी ने मुस्कुराकर कहा, "जब गर्मियाँ थीं, तब तुम्हारे पास काम करने का बहुत समय था। अब सर्दियाँ आ गई हैं और खाने की कमी है।" उसके शब्द कड़वे नहीं थे, पर बिल्कुल सच्चे थे।

टिड्डा चुपचाप चींटी की बात सुनता रहा। हवा चलती रही, धूप में फैले दाने चमकते रहे... और वह बिना कुछ कहे वहीं खड़ा सुनता रहा। चींटी ने ठहरकर, नाप-तौलकर कहा, "हमें समय रहते अपने भविष्य के लिए तैयारी करनी चाहिए।" उसकी बात बहुत छोटी थी, पर वह सीधे टिड्डे के मन तक पहुँच गई।

टिड्डे को अपनी गलती समझ आ गई। उसका मन भारी हो गया, उसने धीरे से अपना सिर झुका लिया... और फिर वह चुपचाप वहाँ से चला गया। चींटियाँ फिर से अपने काम में जुट गईं। दाने ढोए जाते रहे, कतारें चलती रहीं, और धूप ढलने से पहले हर दाना अपनी सही जगह पहुँच गया।

रास्ते में चलते-चलते टिड्डे ने मन में ठान लिया कि अगली बार वह समय को यूँ ही बर्बाद नहीं करेगा! अब वह भी समय रहते अपनी तैयारी करेगा, ठीक उन मेहनती चींटियों की तरह। हमें समय रहते मेहनत करनी चाहिए और अपने भविष्य के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए। जो व्यक्ति समय की सही कदर करना सीख लेता है, वह मुश्किल समय में कभी परेशान नहीं होता...

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