
दो सिर वाली चिड़िया
Beginner · ≈ 4 min story · 2 min read
एक जंगल में एक अनोखी चिड़िया रहती थी, जिसका शरीर एक था पर सिर दो थे। एक दिन पहले सिर ने स्वादिष्ट फल अकेले खा लिया और दूसरे सिर को नहीं दिया। दूसरे सिर ने गुस्से में बदला लेने के लिए जहरीला फल खा लिया, और नुकसान दोनों का हुआ। कहानी सिखाती है कि बाँटना और साथ चलना कितना ज़रूरी है।
कई साल पहले की बात है। एक जंगल में एक बहुत ही अनोखी चिड़िया रहती थी। उसका शरीर तो एक था... लेकिन सिर दो थे! दोनों सिर एक ही शरीर से जुड़े थे, पर दोनों की सोच हमेशा एक जैसी नहीं होती थी। एक दिन वह चिड़िया जंगल में घूम रही थी। तभी पहले सिर की नज़र एक पेड़ पर लगे बहुत ही स्वादिष्ट फल पर पड़ी। "वाह! कितना स्वादिष्ट फल है!" उसने फल तोड़ा और मज़े से खाने लगा। दूसरे सिर ने उसे फल खाते देखा तो उसका भी मन ललचा गया। उसने कहा, "यह फल तो बहुत स्वादिष्ट लग रहा है। मुझे भी थोड़ा खाने के लिए दो ना!" लेकिन पहले सिर ने फल उसकी ओर बढ़ाने के बजाय खुद ही खाना जारी रखा। "नहीं! इस फल को मैंने देखा है। इसलिए इसे पूरा का पूरा मैं ही खाऊँगा!" दूसरा सिर चुप हो गया। लेकिन उसे यह बात बिल्कुल अच्छी नहीं लगी।
वह सोचता रहा, "हम दोनों का शरीर एक है... फिर इसने मेरे साथ फल क्यों नहीं बाँटा?" कुछ दिन बीत गए। लेकिन दूसरे सिर के मन से वह बात गई नहीं। एक दिन उसे जंगल में एक जहरीला फल दिखाई दिया। उसे देखते ही उसे पहले सिर की बात याद आ गई। उसने सोचा, "उस दिन तुमने मेरा अपमान किया था। अब मैं यह फल खाऊँगा!" पहले सिर ने जैसे ही यह सुना, वह घबरा गया।
"नहीं! रुको!" "यह फल जहरीला है। इसे मत खाना!" फिर उसने समझाते हुए कहा, "हमारे सिर भले ही दो हैं, लेकिन पेट तो एक ही है। अगर तुम यह जहरीला फल खाओगे, तो नुकसान हम दोनों को होगा!" लेकिन दूसरा सिर अब भी गुस्से में था। उसने पहले सिर की बात नहीं मानी... और जहरीला फल खा लिया। ज़हर पूरे शरीर में फैल गया। और कुछ ही समय बाद वह अनोखी चिड़िया मर गई। दोनों सिरों की लड़ाई में... नुकसान किसी एक का नहीं, बल्कि दोनों का हुआ। अगर दोनों ने एक-दूसरे को अपना समझा होता... अगर पहले सिर ने फल बाँट लिया होता... और दूसरे सिर ने बदला लेने के बजाय समझदारी दिखाई होती... तो शायद ऐसा कभी नहीं होता।
और इसी सीख के साथ दो सिर वाली चिड़िया की कहानी यहीं खत्म होती है। लेकिन... उसी जंगल से कुछ दूर एक गाँव था। उस गाँव में रहती थी एक ग्वालिन, जिसका नाम था शान्तिदेवी। वह रोज़ अपने घर के आँगन में बैठकर मेहनत से मक्खन बनाती थी। एक दिन उसके पास एक पड़ोसन आई और बोली, "शान्तिदेवी... मुझे तुम्हारी मदद चाहिए।" उसके बच्चों के पास खाने के लिए कुछ भी नहीं था। शान्तिदेवी ने उसकी बात सुनी... और बिना देर किए मक्खन का एक डिब्बा उसके हाथ में रख दिया। लेकिन उसे क्या पता था... यही छोटा-सा अच्छा काम एक दिन घूमकर फिर उसी के दरवाज़े पर लौटने वाला था। आखिर कैसे?
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