
बैल और लालची सियार
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जंगल में दो सियार एक मोटे-ताज़े बैल को देखते हैं। एक सियार समझदारी की सलाह ठुकराकर लालच में बैल के पीछे लग जाता है। दिन, महीने और पंद्रह साल बीत जाते हैं, पर उसे कुछ नहीं मिलता। आखिर में वह समझता है कि जो पास है, उसकी कद्र करना ही असली समझदारी है।
एक बार एक बैल जंगल में घूम रहा था, और उसी जंगल में दो सियार भी रहते थे। एक दिन दोनों सियारों की नज़र उस बैल पर पड़ी, जो बड़ा मोटा-ताज़ा था। उसे देखकर एक सियार के मुँह में पानी आ गया। उसने चहकते हुए अपने साथी से कहा, "देखो! कितना बड़ा बैल है। अगर हम इसे मार लें, तो कई दिनों तक मज़े से खाना मिलेगा!"
दूसरे सियार ने उसे धीरे से समझाया, "बैल बहुत ताकतवर है। उसका शिकार करना आसान नहीं होगा। हमारे पास जो खाना है, उसी में खुश रहना बेहतर है।" लेकिन पहला सियार बैल को छोड़ने के लिए तैयार नहीं था। "नहीं! मैं इस बैल को जरूर हासिल करूँगा," पहला सियार अड़कर बोला। उसने अपने साथी की बात नहीं मानी और बैल के पीछे-पीछे चल पड़ा। एक दिन बीता... फिर दूसरा, फिर कई दिन बीत गए।
सियार बस बैल के पीछे घूमता रहा। वह हर दिन यही सोचता, "आज मौका मिलेगा... नहीं, शायद कल!" लेकिन मौका आता ही नहीं था। दिन बीतते-बीतते पूरे पंद्रह साल गुजर गए! फिर भी सियार उस बैल का शिकार नहीं कर पाया। आखिरकार एक दिन वह थककर रुक गया।
उसने मन ही मन सोचा, "मैंने इतने साल किस चीज़ के पीछे बर्बाद कर दिए?" जिस लालच में उसने अपने साथी की बात नहीं मानी थी, वही लालच उसे इतने साल तक भटकाता रहा। तब उसे समझ आया कि जो चीज़ हमारे पास है, उसकी कद्र करना भी जरूरी है। सिर्फ ज्यादा पाने के लालच में अपना समय और सुख खो देना समझदारी नहीं है। और इसी सीख के साथ बैल और लालची सियार की कहानी पूरी हुई।
लेकिन उसी जंगल में कुछ कबूतर दाना चुगने नीचे उतरे... उन्हें क्या पता था कि दानों के नीचे एक शिकारी का जाल बिछा था!
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