
चूहा और साधु
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एक शांत मंदिर के पास रहने वाले साधु का सादा जीवन तब उलट-पुलट हो जाता है, जब एक नन्हा चूहा हर रात उनका भोजन चुराने लगता है। साधु खाना छिपाते हैं, ऊँची जगह पर लटकाते हैं, पर चूहा हर बार छलांग लगाकर वहाँ पहुँच ही जाता है। तभी एक विद्वान पंडित आते हैं और एक सीधा सवाल पूछते हैं: इस छोटे-से चूहे में इतनी ताकत आती कहाँ से है? दोनों धैर्य के साथ चूहे का पीछा करते हैं और उसके बिल में छिपा जमा किया हुआ भोजन खोज निकालते हैं। यही उसकी असली ताकत का राज़ था। यह कोमल कहानी बच्चों को सिखाती है कि किसी भी समस्या से घबराने के बजाय पहले उसकी जड़ समझनी चाहिए, क्योंकि सच्ची जीत ताकत से नहीं, समझदारी से मिलती है।
एक बार की बात है... एक शांत मंदिर के पास... एक छोटी-सी झोपड़ी थी। उस झोपड़ी में... एक साधु रहा करते थे। वे बहुत सरल जीवन जीते थे। सुबह-सुबह... वे मंदिर जाते... प्रार्थना करते... और फिर अपनी झोपड़ी में लौटकर... थोड़ा-सा भोजन बनाते। उनका जीवन शांत था... सादा था... और बहुत संतोष से भरा था।
लेकिन... एक दिन... उनकी इस शांति में... एक नन्हा-सा मेहमान आ गया। एक चूहा! वह चुपके से... झोपड़ी के अंदर घुस आया। साधु ने उसे देखा नहीं। रात को... जब साधु सो गए... चूहा धीरे-धीरे... भोजन के पास पहुंचा। उसने थोड़ा-सा खाना उठाया... और फुर्रर्र... भाग गया! अगली सुबह... साधु ने देखा कि...
उनका कुछ भोजन गायब था। उन्हें आश्चर्य हुआ। उन्होंने सोचा,
"शायद मैंने ही...
कम खाना रखा होगा।" लेकिन... अगली रात... फिर वही हुआ। चूहा आया... खाना उठाया... और भाग गया। अब साधु समझ गए...
"अच्छा! तो यह काम...
किसी चूहे का है।" उन्होंने भोजन छिपा दिया। फिर उसे ऊँची जगह पर रख दिया। फिर उससे भी ऊँची जगह पर... लेकिन... चूहा हर बार... किसी न किसी तरह... वहां तक पहुंच जाता। साधु हैरान थे।
"आखिर यह छोटा-सा चूहा... इतनी ऊंची छलांग... कैसे लगा लेता है?"
कई दिनों तक... यह सिलसिला चलता रहा। साधु परेशान हो गए। एक दिन... उन्होंने हाथ में... एक पतली-सी छड़ी पकड़ ली। वे मन ही मन सोच रहे थे,
"आज अगर यह चूहा आया... तो मैं इसे डराकर... यहां से भगा दूंगा।"
उसी समय... एक विद्वान पंडित... साधु से मिलने उनकी झोपड़ी में आए। साधु ने उनका स्वागत किया। दोनों बैठकर बातें करने लगे। लेकिन... पंडित ने जल्दी ही महसूस किया... कि साधु का ध्यान... उनकी बातों में बिल्कुल नहीं था। साधु बार-बार... झोपड़ी के एक कोने की ओर देख रहे थे।
कभी छड़ी को देखते... कभी ऊपर लटके भोजन को... और फिर चुपचाप... चूहे का इंतजार करते। पंडित ने थोड़ा मुस्कुराकर पूछा,
"साधु महाराज... क्या बात है? लगता है... आपका मन हमारी बातचीत में... बिल्कुल नहीं है।"
साधु ने तुरंत माफी मांगी।
"क्षमा कीजिए, पंडित जी। यह छोटा-सा चूहा... कई दिनों से मुझे बहुत परेशान कर रहा है।"
उन्होंने ऊपर लटकी... भोजन की मटकी की ओर इशारा किया।
"मैं खाना... कितनी भी ऊंचाई पर रख दूं... वह वहां तक पहुंच जाता है! मैं समझ ही नहीं पा रहा... कि आखिर इसमें इतनी ताकत आती कहां से है।"
पंडित ने ध्यान से चूहे को देखा। फिर उन्होंने शांत स्वर में कहा,
"हम्म... चूहे में इतनी ताकत... बिना किसी कारण के नहीं हो सकती।"
साधु ने हैरानी से पूछा,
"तो फिर... इसका कारण क्या हो सकता है?"
पंडित बोले,
"मेरा अनुमान है... इस चूहे ने कहीं... बहुत सारा भोजन जमा करके रखा है। जब किसी के पास... भरपूर भोजन हो... तो उसे अपने ऊपर... बहुत विश्वास होने लगता है। हमें इसके बिल का पता लगाना होगा।"
साधु ने तुरंत हामी भरी।
"चलिए! आज इसका रहस्य... पता लगाते हैं।"
अगली सुबह... साधु और पंडित... चूहे के पीछे-पीछे चलने लगे। चूहा कभी झाड़ी के पीछे छिपता... कभी पत्थर के नीचे जाता... और कभी अचानक... किसी छोटे-से छेद में घुस जाता। दोनों ने धैर्य नहीं छोड़ा। वे चुपचाप... उसका पीछा करते रहे। आखिरकार... चूहा एक पुराने कोने में पहुंचा... और एक छोटे-से बिल में घुस गया।
पंडित मुस्कुराए।
"यही है! इसके सारे रहस्य की चाबी... यहीं छिपी है।"
उन्होंने सावधानी से... बिल के आसपास की मिट्टी हटाई। और फिर... दोनों की आंखें खुली की खुली रह गईं। बिल के अंदर... बहुत सारा भोजन जमा था! अनाज... टुकड़े... सूखे दाने... और न जाने कितनी चीजें... जो चूहे ने कई दिनों में... इकट्ठी की थीं। साधु समझ गए।
"तो यही इसकी ताकत का कारण था!"
पंडित ने सिर हिलाया।
"बिल्कुल। जब तक इसके पास... इतना भोजन रहेगा... तब तक इसे अपने ऊपर... पूरा विश्वास रहेगा।"
दोनों ने मिलकर... चूहे का जमा किया हुआ भोजन... वहां से हटा दिया। अब... उसके पास कुछ भी नहीं बचा था। चूहा वापस आया... तो उसने देखा... उसका खजाना गायब था। वह इधर-उधर दौड़ा। फिर बिल के अंदर देखा। फिर बाहर आया। कुछ नहीं था। बेचारा चूहा... बहुत परेशान हो गया।
उसने फिर भोजन ढूंढने की कोशिश की... लेकिन उसे कुछ नहीं मिला। दिन बीतते गए... और धीरे-धीरे... चूहा कमजोर होने लगा। उसका आत्मविश्वास भी... कम होने लगा। कुछ दिनों बाद... वह फिर साधु की झोपड़ी में आया। उसने ऊपर देखा। मटकी में... खाना रखा था। चूहे ने सोचा,
"मैं पहले भी... इतनी ऊंची छलांग लगा चुका हूं। आज भी लगा लूंगा!"
उसने पीछे कदम लिया... दौड़ा... और पूरी ताकत से... ऊपर छलांग लगाई। लेकिन... इस बार... वह मटकी तक पहुंच ही नहीं पाया। धप्प! वह नीचे आ गिरा। उसने फिर कोशिश की। एक बार... फिर दूसरी बार... लेकिन हर बार... वह पहले से थोड़ा ही ऊपर जा पाया। साधु समझ गए...
अब चूहे की ताकत... पहले जैसी नहीं रही थी। उन्होंने हाथ में छड़ी उठाई... और चूहे को डराकर कहा,
"बस! अब बहुत हुआ।"
चूहा घबरा गया। वह तेजी से... झोपड़ी से बाहर भागा... और जितनी दूर जा सकता था... दौड़ता चला गया। उस दिन के बाद... वह चूहा... फिर कभी साधु की झोपड़ी में... वापस नहीं आया। साधु ने राहत की सांस ली। उन्होंने पंडित की ओर देखकर कहा,
"अब मैं समझ गया... किसी समस्या को केवल देखकर... उससे छुटकारा नहीं पाया जा सकता। पहले यह समझना जरूरी है... कि उसे ताकत... कहां से मिल रही है।"
पंडित मुस्कुराए।
"बिल्कुल। जब हम समस्या की जड़ समझ लेते हैं... तो उसका समाधान... बहुत आसान हो जाता है।"
साधु ने सिर हिलाया। उस दिन... उन्होंने सिर्फ अपने भोजन की रक्षा नहीं की... बल्कि एक बहुत बड़ी सीख भी पाई। बच्चों... किसी समस्या से घबराने के बजाय... पहले यह समझने की कोशिश करो... कि उसे ताकत कहां से मिल रही है। जब समस्या की जड़ मिल जाती है... तो उसे हल करने का रास्ता भी मिल जाता है।
और याद रखना... सिर्फ ताकतवर होना ही जरूरी नहीं है। सच्ची जीत... बुद्धि और समझदारी से मिलती है।
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