
मुर्गी चुराने वाली लालची पड़ोसन
Intermediate · ≈ 4 min story · 3 min read
एक ईमानदार औरत की प्यारी मुर्गी दाना चुगते-चुगते पड़ोस के घर में चली जाती है, और लालची पड़ोसन उसे पकाकर खा जाती है। पूछने पर वह साफ़ मुकर जाती है और कहती है कि उसने मुर्गी देखी तक नहीं। सबूत न होने पर मुर्गी की मालकिन मर्यादा राम की अदालत पहुँचती है। मर्यादा राम एक छोटी-सी चतुर तरकीब से, बिना किसी गवाह के, झूठ को सबके सामने खोल देते हैं। 5 से 8 साल के बच्चों के लिए सोने से पहले सुनाने लायक एक मज़ेदार और समझदारी सिखाती कहानी।
एक छोटे से गाँव में... दो पड़ोसनें रहती थीं। एक मेहनती और ईमानदार थी। उसके घर में एक प्यारी-सी मुर्गी थी... जो हर सुबह सुनहरे अंडे तो नहीं... लेकिन ताज़े अंडे ज़रूर देती थी। एक दिन... दाना चुगते-चुगते... वह मुर्गी गलती से पड़ोस वाले घर में चली गई। उधर रहने वाली औरत बहुत लालची थी।
जैसे ही उसने मोटी-ताज़ी मुर्गी देखी... उसकी आँखें चमक उठीं। उसने मन ही मन सोचा,
"वाह! आज तो बिना मेहनत के स्वादिष्ट दावत मिल गई।"
उसने मुर्गी पकड़ ली... और किसी को बताए बिना... उसे पकाकर खा गई। शाम हुई... लेकिन मुर्गी अपने घर वापस नहीं लौटी। मुर्गी की मालकिन बहुत परेशान हो गई। वह तुरंत अपनी पड़ोसन के घर पहुँची।
"बहन... क्या मेरी मुर्गी इधर आई थी?"
लालची औरत ने तुरंत सिर हिलाया।
"नहीं! मैंने तो तुम्हारी मुर्गी देखी तक नहीं। तुम गलत घर आ गई हो।"
मुर्गी की मालकिन समझ गई... कि कुछ न कुछ गड़बड़ ज़रूर है। लेकिन... उसके पास कोई सबूत नहीं था। आख़िरकार... वह न्याय माँगने मर्यादा राम की अदालत पहुँची। उसने सारी बात बताई। मर्यादा राम ने पूछा,
"क्या तुम्हारे पास कोई गवाह है?"
औरत ने दुखी होकर कहा,
"नहीं महाराज। मैंने बस अपनी मुर्गी को उसके घर में जाते देखा था।"
मर्यादा राम ने लालची पड़ोसन को भी बुलवाया। वह बड़ी मासूम बनकर बोली,
"महाराज... मैं निर्दोष हूँ। चाहें तो मेरा पूरा घर खोज लीजिए। आपको कुछ नहीं मिलेगा।"
मर्यादा राम उसकी बात ध्यान से सुनते रहे। उन्हें महसूस हो रहा था... कि औरत सच नहीं बोल रही। लेकिन... बिना सबूत किसी को दोषी ठहराना भी उचित नहीं था। उन्होंने दोनों औरतों से कहा,
"आज तुम दोनों घर जाओ। कल मैं अपना निर्णय सुनाऊँगा।"
दोनों औरतें मुड़कर जाने लगीं। तभी... मर्यादा राम ने ऊँची आवाज़ में कहा,
"अरे! देखो तो सही... कैसी अजीब बात है! मुर्गी चुराकर खाने वाली औरत... अपने बालों में मुर्गी का पंख लगाकर अदालत तक आ गई!"
इतना सुनते ही... लालची औरत घबरा गई। बिना सोचे-समझे... उसने तुरंत अपने सिर पर हाथ फेर लिया... मानो सचमुच कोई पंख निकालना चाहती हो। बस... यही वह पल था... जिसका मर्यादा राम इंतज़ार कर रहे थे। उन्होंने मुस्कुराकर कहा,
"रुक जाओ। मैंने तुम्हारे बालों में कोई पंख देखा ही नहीं था। अगर तुम निर्दोष होती... तो अपने सिर को छूती भी नहीं। तुम्हारी घबराहट ने ही... तुम्हारा सच सबके सामने ला दिया।"
पूरा दरबार आश्चर्य से भर गया। लालची औरत शर्म से सिर झुका कर रोने लगी।
"महाराज... मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। लालच में आकर मैंने मुर्गी चुरा ली... और उसे खा भी लिया। मुझे क्षमा कर दीजिए।"
मर्यादा राम ने शांत स्वर में कहा,
"गलती मान लेना अच्छी बात है... लेकिन... गलती की सज़ा भी मिलनी चाहिए।"
उन्होंने आदेश दिया... कि वह औरत मुर्गी की पूरी कीमत चुकाए... और झूठ बोलने के अपराध में जुर्माना भी भरे। मुर्गी की मालकिन को न्याय मिल गया। वह खुशी-खुशी अपने घर लौट गई। और उस दिन... पूरे गाँव ने एक बात हमेशा के लिए सीख ली। बच्चों... झूठ बोलने वाला अक्सर अपनी ही घबराहट से पकड़ा जाता है।
और सच्चाई को छिपाना... दुनिया का सबसे कठिन काम है।
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