नदी के किनारे पीठ पर बोरे लादे खड़ा गधा और पास मुस्कुराता हुआ व्यापारी

व्यापारी और मूर्ख गधा

Beginner · ≈ 3 min story · 3 min read

एक मेहनती गधा रोज़ व्यापारी के नमक के बोरे बाजार तक ढोता है। एक दिन वह नदी में फिसलकर गिर जाता है और नमक घुलने से उसका बोझ हल्का हो जाता है, तो वह यही चाल बार-बार दोहराने लगता है। व्यापारी उसकी चालाकी भाँप लेता है और अगले दिन नमक की जगह रूई के बोरे लाद देता है। पानी सोखकर भारी हुई रूई गधे को वह सबक सिखाती है, जो वह जीवन भर नहीं भूलता।

किसी छोटे से गाँव में एक व्यापारी रहता था, और उसके पास एक गधा था। वह गधा बहुत मेहनती था, जो रोज़ व्यापारी का सामान अपनी पीठ पर लादकर बाजार तक ले जाता था। एक दिन व्यापारी ने गधे की पीठ पर नमक के भारी बोरे लादे और बाजार की ओर चल पड़ा। रास्ते में एक नदी पड़ती थी, जिसका ठंडा पानी धीरे-धीरे बहता रहता था।

व्यापारी और गधा नदी के पास पहुँचे ही थे कि अचानक गधे का पैर फिसल गया। धड़ाम! गधा सीधा नदी में जा गिरा। जब वह किसी तरह पानी से बाहर आया, तो उसे अपनी पीठ बहुत हल्की महसूस हुई। उसने पीछे मुड़कर देखा. नमक के बोरे हल्के हो चुके थे, क्योंकि नदी के पानी में सारा नमक घुल गया था।

गधा बहुत खुश हुआ और मन ही मन सोचने लगा, "अरे वाह! नदी में गिरने से तो मेरा बोझ बहुत हल्का हो गया।" व्यापारी को कुछ समझ नहीं आया कि नमक के बोरे इतने हल्के कैसे हो गए, और वह गधे को लेकर वापस घर चला गया। अगले दिन व्यापारी ने फिर गधे की पीठ पर नमक के बोरे लादे, और दोनों बाजार के लिए निकल पड़े। जब वे नदी के पास पहुँचे, तो गधा पिछली बात याद करके बहुत खुश हुआ।

उसने जान-बूझकर पानी में छलांग लगा दी। छपाक! नमक फिर पानी में घुल गया, और गधे की पीठ का बोझ फिर हल्का हो गया। गधा मन ही मन हँसने लगा। अब उसे लगने लगा था कि नदी में गिरना बहुत अच्छी चाल है, पर व्यापारी उसकी सारी चाल समझ गया था।

व्यापारी ने चुपचाप सोचा, "अच्छा! तो यह गधा जान-बूझकर नदी में गिर रहा है।" अगले दिन उसने गधे की पीठ पर नमक के बोरे बिल्कुल नहीं रखे, बल्कि इस बार उस पर रूई से भरे बोरे लाद दिए। गधा हमेशा की तरह व्यापारी के साथ नदी की ओर चल पड़ा, और नदी के पास पहुँचते ही उसने फिर वही पुरानी चाल चली। धड़ाम! गधा पानी में जा गिरा, यह सोचकर कि इस बार भी उसका बोझ हल्का हो जाएगा।

लेकिन जैसे ही रूई ने पानी सोखा, बोरे बहुत भारी हो गए। गधा बड़ी मुश्किल से पानी से बाहर निकला, और उसने महसूस किया कि उसकी पीठ का बोझ पहले से कई गुना ज्यादा भारी हो गया है। गधा परेशान होकर हाँफते हुए चिल्लाया, "अरे! आज तो मेरा बोझ और भी भारी हो गया!" व्यापारी यह देखकर बस धीरे से मुस्कुराया।

अब गधे को अपनी गलती अच्छी तरह समझ आ गई थी। उसने मन ही मन सोचा, "मैं अपनी चालाकी से काम आसान करना चाहता था। लेकिन उसी चालाकी ने मेरा काम और मुश्किल कर दिया।" व्यापारी ने गधे को प्यार से समझाया, "देखो, मेहनत से बचने के लिए गलत चाल चलोगे, तो नुकसान तुम्हारा ही होगा।" गधे ने चुपचाप अपना सिर झुका लिया।

उस दिन के बाद उसने कभी जान-बूझकर नदी में गिरने की कोशिश नहीं की। अब वह ईमानदारी से अपना काम करता, और बिना किसी चालाकी के हर सुबह व्यापारी के साथ बाजार जाता। चालाकी और धोखे से काम कभी आसान नहीं होता, प्यारे बच्चों। मेहनत और ईमानदारी का रास्ता ही हमेशा सबसे बेहतर होता है... हमेशा।

More bedtime stories

एक वृद्ध ब्राह्मण अपना पीतल का घड़ा पड़ोसी को सौंपते हुए, और घड़े में दाल के नीचे छिपे सोने के चमकते सिक्के।

ब्राह्मण का सोना

एक वृद्ध ब्राह्मण और उनकी पत्नी तीर्थ यात्रा पर जाने से पहले अपनी जीवनभर की कमाई, सोने के सिक्के, दाल से भरे पीतल के घड़े में छिपाकर पड़ोसी के पास रख जाते हैं। पड़ोसी को सच्चाई का पता चलता है और लालच उसे बेईमान बना देता है। लौटने पर ब्राह्मण को सिर्फ दाल मिलती है और पड़ोसी सब कुछ जानने से इनकार कर देता है। तब मर्यादा राम बाँस की एक खोखली देवी मूर्ति और एक होशियार बच्चे की मदद से ऐसी तरकीब रचते हैं कि सच खुद बाहर आ जाता है। सोना लौटाया जाता है और पूरा राज्य सीखता है कि भरोसा ही सबसे बड़ी दौलत है।

Intermediate · ≈ 5 min

पानी पर बहते हरे पत्ते पर चढ़ी एक नन्ही चींटी, और ऊपर पेड़ की डाल से उसे देखती हुई कोयल

चींटी और कोयल

भीषण गर्मी में पानी की तलाश में निकली एक नन्ही चींटी नाले में गिर जाती है और डूबने लगती है, तभी पेड़ पर बैठी कोयल पत्ता गिराकर उसकी जान बचा लेती है। दोनों गहरे दोस्त बन जाते हैं, और एक दिन जब शिकारी कोयल को जाल में पकड़ लेता है, तो वही छोटी-सी चींटी उसके पैर पर काटकर अपनी दोस्त को छुड़ा लेती है। यह कहानी बच्चों को सिखाती है कि किया हुआ हर नेक काम कभी न कभी लौटकर जरूर आता है।

Beginner · ≈ 4 min

धूप में अनाज के दाने ढोती और कतार बनाकर चलती मेहनती चींटियाँ, और पास ही ठंड में काँपता खड़ा एक भूखा टिड्डा।

चींटी और टिड्डा

सर्दियाँ शुरू होते ही चींटियों की पूरी बस्ती अनाज जमा करने में जुट जाती है, और तभी ठंड और भूख से काँपता एक टिड्डा उनसे दो-तीन दाने माँगने आ पहुँचता है। चींटी उसे ताना नहीं मारती, बस इतना पूछती है कि पूरी गर्मियों में उसने अपने लिए कुछ क्यों नहीं जोड़ा। यह कोमल कहानी बच्चों को समय की कदर करना और भविष्य के लिए तैयार रहना सिखाती है।

Beginner · ≈ 3 min

शाम के समय बाग में ऊँची बेल पर लटके रसीले अंगूरों की ओर छलांग लगाती एक भूखी लोमड़ी।

लोमड़ी और अंगूर

भीषण गर्मी में भोजन की तलाश में भटकती एक भूखी लोमड़ी को एक सुंदर बाग में ऊँची बेल पर लटके रसीले अंगूरों के गुच्छे दिखाई देते हैं। वह बार-बार दौड़कर छलांग लगाती है, गिरती है और फिर उठकर कोशिश करती है, लेकिन अंगूर बहुत ऊँचाई पर हैं। थक-हारकर लौटते हुए वह मुँह बनाकर कह देती है कि अंगूर तो खट्टे थे, और यहीं से बच्चों को अपनी असफलता स्वीकार करने की प्यारी सीख मिलती है।

Beginner · ≈ 4 min