दरबार में मर्यादा राम के सामने खड़े दो मित्र, पास ही ज़मीन पर बिखरे मिट्टी के टूटे हुए घड़े।

मरा हुआ हाथी और टूटे हुए घड़े

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अपने बेटे की शादी के लिए एक व्यक्ति अपने मित्र से हाथी उधार लेता है, पर लौटते समय हाथी बीमार पड़कर मर जाता है। मालिक मुआवज़ा लेने से इनकार कर देता है और ज़िद पकड़ लेता है कि उसे वही हाथी जीवित वापस चाहिए। मामला मर्यादा राम के दरबार पहुँचता है, जहाँ वे समझाने के बजाय एक ऐसा उपाय करते हैं कि मिट्टी के पुराने घड़े टूटने पर ज़िद्दी मालिक खुद ही समझ जाता है कि जो टूट गया या खो गया, वह पहले जैसा नहीं हो सकता। अंत में दोनों मित्र एक-दूसरे को क्षमा कर शांति से घर लौटते हैं।

एक समय की बात है... एक नगर में... दो मित्र रहते थे। एक दिन... पहले व्यक्ति ने... अपने बेटे की शादी के लिए... दूसरे मित्र से... उसका हाथी कुछ दिनों के लिए उधार माँगा। मित्र ने... खुशी-खुशी... अपना प्रिय हाथी उसे दे दिया। शादी बड़े धूमधाम से हुई। लेकिन... वापसी के रास्ते में...

अचानक... हाथी बीमार पड़ गया। बहुत कोशिश करने के बाद भी... वह बच नहीं पाया। हाथी मर गया। हाथी उधार लेने वाला व्यक्ति... बहुत दुखी हुआ। वह तुरंत... अपने मित्र के पास गया... और बोला,

"मित्र... मुझे बहुत दुख है। तुम्हारा हाथी अचानक मर गया। मैं उसकी पूरी कीमत देने को तैयार हूँ।"

लेकिन... हाथी का मालिक मानने को तैयार नहीं था। वह गुस्से में बोला,

"मुझे पैसे नहीं चाहिए। मुझे मेरा वही हाथी... जिंदा वापस चाहिए।"

दोनों... न्याय के लिए... मर्यादा राम के दरबार पहुँचे। मर्यादा राम ने... दोनों की बातें ध्यान से सुनीं। उन्होंने हाथी के मालिक को समझाया,

"जब कोई जीव... मर जाता है... तो उसे वापस जीवित नहीं किया जा सकता। तुम उचित मुआवज़ा स्वीकार कर लो।"

लेकिन... वह अपनी ज़िद पर अड़ा रहा।

"नहीं! मुझे मेरा वही हाथी... जिंदा चाहिए।"

मर्यादा राम मुस्कुराए। उन्होंने सोचा,

"इसे समझाने का... एक अलग तरीका अपनाना होगा।"

उन्होंने कहा,

"आज के लिए... मुकदमे की सुनवाई यहीं समाप्त करते हैं। कल फिर मिलते हैं।"

कुछ देर बाद... उन्होंने चुपचाप... हाथी उधार लेने वाले व्यक्ति को बुलाया। उन्होंने उससे कहा,

"कल सुबह... अपने घर के दरवाज़े के पीछे... अपने सारे मिट्टी के घड़े... एक के ऊपर एक लगा देना। और... जब तक हाथी का मालिक... खुद तुम्हें बुलाने न आए... तब तक दरबार मत आना।"

उस व्यक्ति ने... वैसा ही किया। अगले दिन... हाथी का मालिक... समय पर दरबार पहुँचा। लेकिन... दूसरा व्यक्ति नहीं आया। वह गुस्से में बोला,

"वह जानबूझकर नहीं आया! मैं अभी उसे बुलाकर लाता हूँ।"

वह तेज़ी से... उसके घर पहुँचा। बिना सोचे-समझे... उसने ज़ोर से दरवाज़ा धक्का दिया। दरवाज़ा खुलते ही... पीछे रखे सारे मिट्टी के घड़े... धड़ाम-धड़ाम... ज़मीन पर गिर पड़े। सभी घड़े... टूटकर बिखर गए। घर का मालिक... दौड़ता हुआ बाहर आया। वह दुखी होकर बोला,

"अरे! तुमने क्या कर दिया? ये घड़े... हमारे परिवार की कई पीढ़ियों से चले आ रहे थे। ये हमारे लिए... बहुत अनमोल थे।"

हाथी का मालिक घबरा गया। वह बोला,

"मुझे माफ़ कर दो। मैं तुम्हें... इन सबकी कीमत चुका दूँगा।"

लेकिन... घर का मालिक बोला,

"मुझे पैसे नहीं चाहिए। मुझे मेरे वही घड़े... जैसे थे वैसे ही... साबुत वापस चाहिए।"

दोनों फिर... मर्यादा राम के दरबार पहुँचे। घर के मालिक ने शिकायत की,

"महाराज... इन्होंने मेरे परिवार के... बहुत पुराने और अनमोल घड़े तोड़ दिए। मुझे पैसे नहीं चाहिए। मुझे मेरे वही घड़े... साबुत वापस चाहिए।"

मर्यादा राम ने... हाथी के मालिक की ओर देखा... और शांत स्वर में बोले,

"ज़रूर। जिस दिन... ये व्यक्ति... तुम्हारा मरा हुआ हाथी... फिर से जीवित कर देगा... उसी दिन... तुम्हारे टूटे हुए घड़े भी... पहले जैसे साबुत कर देगा।"

पूरा दरबार... एकदम शांत हो गया। हाथी का मालिक... अपनी गलती समझ गया। उसे एहसास हुआ... कि जैसे... मरा हुआ हाथी... जीवित नहीं हो सकता... वैसे ही... टूटे हुए घड़े... पहले जैसे नहीं बन सकते। उसने शर्मिंदा होकर कहा,

"महाराज... अब मुझे अपनी गलती समझ आ गई। मैं उचित मुआवज़ा स्वीकार करता हूँ।"

मर्यादा राम मुस्कुराए। उन्होंने हाथी उधार लेने वाले व्यक्ति से कहा,

"तुम हाथी की उचित कीमत... इसके मालिक को दे दो।"

और मामला... वहीं समाप्त हो गया। दोनों ने... एक-दूसरे को क्षमा किया... और शांति से... अपने-अपने घर लौट गए। उस दिन... पूरे राज्य ने... मर्यादा राम की बुद्धिमानी की फिर से प्रशंसा की। बच्चों... जो चीज़ हमेशा के लिए खो जाती है... उसे वापस नहीं लाया जा सकता। ऐसे समय में...

बुद्धिमानी यही है कि उचित समाधान स्वीकार किया जाए... न कि असंभव ज़िद की जाए।

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