जंगल में एक चालाक लोमड़ी सपाट प्लेट से सूप पी रही है और पास खड़ा लंबी चोंच वाला सारस भूखा उसे देख रहा है।

लोमड़ी और सारस

Beginner · ≈ 45 min story · 2 min read

एक चालाक लोमड़ी ने अपने दोस्त सारस को खाने पर बुलाया और शरारत से सूप एक सपाट प्लेट में परोस दिया, जिससे लंबी चोंच वाला सारस एक बूंद भी नहीं पी सका। अगले दिन सारस ने बिना गुस्सा किए लोमड़ी को अपने घर बुलाया और पतले मुँह वाले जग में सूप परोसा। भूखी बैठी लोमड़ी को उस दिन समझ आया कि दूसरों के साथ की गई चालाकी कभी-कभी लौटकर हमारे पास ही आती है।

एक बार की बात है... एक घने जंगल में एक बहुत चालाक लोमड़ी रहती थी। एक दिन उसने अपने दोस्त सारस को अपने घर खाने पर बुलाया, और सारस खुशी-खुशी उसके घर जा पहुँचा। लोमड़ी ने मुस्कुराते हुए कहा, "आओ, सारस दोस्त! आज मैंने तुम्हारे लिए बहुत स्वादिष्ट सूप बनाया है।" सारस ने चहकते हुए जवाब दिया, "वाह, बहुत अच्छा। मुझे तो बहुत भूख लगी है।"

लोमड़ी ने दोनों के सामने सूप परोस दिया। लेकिन... उसने सूप एक बिल्कुल सपाट प्लेट में परोसा था। फिर उसने तुरंत अपना मुँह प्लेट में लगाया और मज़े से सूप पीने लगी, सुर्र, सुर्र। बेचारा सारस क्या करता। उसकी लंबी चोंच प्लेट में जा ही नहीं पा रही थी, वह बार-बार कोशिश करता रहा, पर एक बूंद भी उसके मुँह तक नहीं पहुँची। आखिरकार सारस भूखा ही बैठा रहा।

लोमड़ी ने पेट भरकर सारा सूप पी लिया और मन ही मन बहुत खुश हुई। फिर वह भोलेपन से बोली, "अरे सारस दोस्त, तुमने तो कुछ खाया ही नहीं!" सारस समझ गया कि लोमड़ी ने यह सब जान-बूझकर किया है, पर उसने ज़रा भी गुस्सा नहीं किया। वह बस धीरे से मुस्कुराया और बोला, "कोई बात नहीं, लोमड़ी दोस्त। कल तुम मेरे घर खाने पर आना।"

अगले दिन लोमड़ी बड़े उत्साह से सारस के घर पहुँची, और सारस ने उसका खूब स्वागत किया। उसने प्यार से कहा, "आओ, लोमड़ी दोस्त, तुम्हारे लिए मैंने बहुत स्वादिष्ट सूप बनाया है।" लोमड़ी खुशी से बोली, "वाह! आज तो खूब मज़ा आएगा!" सारस ने सूप परोसा, लेकिन इस बार... सूप एक लंबे और पतले मुँह वाले जग में था। जग का मुँह इतना पतला था कि उसमें बस एक चोंच ही समा सकती थी।

सारस ने अपनी लंबी चोंच जग के अंदर डाली और आराम से सारा सूप पीने लगा, सुर्र, सुर्र। लोमड़ी ने भी जग में अपना मुँह डालने की कोशिश की, लेकिन उसका मुँह जग के अंदर जा ही नहीं पाया। उसने एक बार कोशिश की, फिर दूसरी बार, फिर तीसरी बार, पर हर बार वह खाली मुँह ही रह गई। सारस ने अपना सारा सूप पी लिया, और लोमड़ी भूखी ही बैठी रह गई।

अब लोमड़ी को अच्छी तरह समझ आ गया कि उसके साथ क्या हुआ है। सारस ने बहुत शांत आवाज़ में धीरे से कहा, "लोमड़ी दोस्त, जैसा व्यवहार हम दूसरों के साथ करते हैं... वैसा ही व्यवहार कभी-कभी हमारे साथ भी हो सकता है।" लोमड़ी को अपनी गलती समझ आ गई। उसने चुपचाप अपना सिर झुका लिया और उसे बहुत शर्म आई। उस दिन के बाद उसने कभी किसी के साथ ऐसी चालाकी नहीं की।

हमें दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करना चाहिए, जैसा हम चाहते हैं कि दूसरे हमारे साथ करें। छल और स्वार्थ से किसी को दुख नहीं देना चाहिए...

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