शाम के समय बाग में ऊँची बेल पर लटके रसीले अंगूरों की ओर छलांग लगाती एक भूखी लोमड़ी।

लोमड़ी और अंगूर

Beginner · ≈ 4 min story · 2 min read

भीषण गर्मी में भोजन की तलाश में भटकती एक भूखी लोमड़ी को एक सुंदर बाग में ऊँची बेल पर लटके रसीले अंगूरों के गुच्छे दिखाई देते हैं। वह बार-बार दौड़कर छलांग लगाती है, गिरती है और फिर उठकर कोशिश करती है, लेकिन अंगूर बहुत ऊँचाई पर हैं। थक-हारकर लौटते हुए वह मुँह बनाकर कह देती है कि अंगूर तो खट्टे थे, और यहीं से बच्चों को अपनी असफलता स्वीकार करने की प्यारी सीख मिलती है।

एक बार की बात है, जंगल में बहुत भयंकर गर्मी पड़ रही थी। सारे जानवर गर्मी से बेहाल थे, पेड़ों की छाँव में सुस्ता रहे थे। और उसी तपती दोपहर में एक लोमड़ी भोजन की तलाश में इधर-उधर भटक रही थी। भटकते-भटकते तभी उसे दूर एक सुंदर बाग दिखाई दिया। बाग में अंगूरों की एक हरी-भरी बेल लटकी हुई थी, और उस बेल पर रसीले, पके हुए अंगूर गुच्छों में झूल रहे थे।

अंगूर देखकर लोमड़ी के मुँह में पानी आ गया। उसने खुश होकर मन ही मन कहा, "वाह, ये अंगूर तो बहुत स्वादिष्ट लग रहे हैं, आज तो मेरी भूख अच्छी तरह मिट जाएगी!" लोमड़ी दबे पाँव अंगूरों के पास पहुँची। उसने अपने पंजे जमाए, कमर सिकोड़ी, ऊपर लटकते गुच्छों को ताका. और एक ऊँची छलांग लगाई। लेकिन वह अंगूरों तक नहीं पहुँच सकी।

उसने थोड़ा पीछे हटकर एक बार फिर पूरी ताकत से छलांग लगाई। हवा में उछली, पंजे फैलाए, मुँह खोला, मगर इस बार भी वह असफल रही। अंगूर बहुत ऊँचाई पर लगे हुए थे। लोमड़ी ने फिर भी हार नहीं मानी। वह बार-बार दौड़कर छलांग लगाती रही, उछलती रही, गिरती रही, फिर उठकर दौड़ती रही। लेकिन अंगूरों की लता तक उसका पंजा भी नहीं पहुँच सका।

अब धीरे-धीरे अंधेरा होने लगा था। उधर लोमड़ी की भूख और बढ़ती जा रही थी, और बार-बार भागने और छलांग लगाने से उसके पैरों में दर्द भी होने लगा। आखिरकार लोमड़ी थक गई। उसने एक बार लंबी साँस लेकर ऊपर लटके अंगूरों की ओर देखा, फिर नज़रें झुका लीं और धीरे-धीरे वहाँ से वापस जाने लगी।

जाते-जाते वह मुँह बनाकर बोली, "मुझे अंगूर खाने ही नहीं थे, वे तो बहुत खट्टे लगते हैं, अच्छा ही हुआ कि मैंने उन्हें नहीं खाया।" यह कहकर लोमड़ी वहाँ से चली गई। लेकिन सच तो यह था कि वे अंगूर बहुत ही स्वादिष्ट थे। लोमड़ी उन्हें पा नहीं सकी थी, इसलिए उसने अपनी असफलता का दोष अंगूरों पर डाल दिया।

बच्चों, कभी-कभी जब हमें कोई चीज़ नहीं मिलती, तो हम भी उसे बेकार बताने लगते हैं। लेकिन अपनी असफलता को स्वीकार करना और उससे सीखना ही असली समझदारी है। नैतिक शिक्षा यह है कि जब हमें कुछ नहीं मिलता, तो हमें यह बहाना नहीं बनाना चाहिए कि वह चीज़ हमारे लायक ही नहीं थी। अपनी असफलता को स्वीकार करके, उससे कुछ सीखकर आगे बढ़ना ही हमें सचमुच आगे ले जाता है...

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